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राजस्थानी होली — गेर, घूमर, गींदड़, चंग और अहमदाबाद के फागुन महोत्सव

8 September 2026
Men dancing Gair in white with colour in the air at a Holi gathering

राजस्थान में होली एक दिन का त्योहार नहीं है। फाल्गुन मास लगते ही गांवों और कस्बों में चंग निकल आते हैं, और अगले कई हफ्तों तक हर संध्या फाग गीतों की बैठक जमती है। अहमदाबाद में बसे राजस्थानी परिवारों ने इस लंबे उत्सव को अपने साथ यहां भी पहुंचा दिया है — सोसाइटी के कॉमन प्लॉट से लेकर मार्केट यार्ड के मैदान तक, फागुन आते ही गेर, घूमर और डफ की थाप सुनाई देने लगती है।

राजस्थान की होली — एक महीने का उत्सव

राजस्थानी परंपरा में होली का उत्सव वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है और धुलंडी तक चलता है। इस पूरी अवधि में प्रतिदिन संध्या को गांव के चौक पर लोग एकत्र होते हैं, चंग बजाते हैं और फाग गीत गाते हैं। यही कारण है कि इसे केवल “होली” नहीं, बल्कि फागुन महोत्सव या फागोत्सव कहा जाता है।

अहमदाबाद में यही परंपरा नरोल के होली फागण महोत्सव और राजस्थान युवा मंच के फागुन महोत्सव जैसे आयोजनों के रूप में जीवित है।

होली के लोक नृत्य

गेर

गेर मारवाड़ और मेवाड़ का पारंपरिक सामूहिक नृत्य है, जिसमें पुरुष हाथों में लकड़ी के डंडे लेकर गोल घेरे में नृत्य करते हैं। डंडों के आपस में टकराने की लयबद्ध ध्वनि इस नृत्य की विशिष्ट पहचान है। परंपरा के अनुसार होली के आसपास सात दिनों तक अलग-अलग स्थानों पर गेर का आयोजन होता है।

अहमदाबाद में यह परंपरा पूरी शक्ति से जीवित है — वटवा के कर्णावती एग्रीकल्चर मार्केट यार्ड में हजारों लोगों का गेर महोत्सव और शहर की सड़कों पर निकलने वाला गेर इसके उदाहरण हैं।

घूमर

घूमर मुख्यतः महिलाओं का नृत्य है, जिसमें घेरदार घाघरा पहनकर गोल घेरे में घूमते हुए नृत्य किया जाता है। यह मूलतः भील समुदाय से आया और बाद में पूरे राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान बन गया। कर्णावती महानगर के आयोजनों में घूमर और गेर की प्रस्तुतियां साथ-साथ होती हैं, जिससे पूरा परिवार सहभागी बन पाता है।

गींदड़

गींदड़ शेखावाटी क्षेत्र — सीकर, चूरू, झुंझुनूं — की विशिष्ट होली परंपरा है। इसमें पुरुष डंडे लेकर बड़े नगाड़े की थाप पर नृत्य करते हैं, और रातभर चलने वाले इन आयोजनों में स्वांग यानी वेशभूषा बदलकर हास्य प्रस्तुतियां भी होती हैं। राजलदेसर की गींदड़ होली इस परंपरा का जीवंत उदाहरण है।

चंग और डफ — फागुन की धड़कन

राजस्थानी होली की असली पहचान इसके वाद्ययंत्र हैं। चंग और डफ बड़े गोलाकार चर्म वाद्य हैं, जिन्हें एक हाथ से पकड़कर दूसरे हाथ की हथेली और उंगलियों से बजाया जाता है। इनकी गूंज दूर तक जाती है, और यही इन्हें खुले में होने वाले सामूहिक आयोजनों के लिए आदर्श बनाती है।

इन वाद्यों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इन्हें बजाने के लिए किसी औपचारिक प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती — हर आयु वर्ग के लोग सहज ही सम्मिलित हो जाते हैं। राजलदेसर में चंग की थाप पर थिरकता पूरा कस्बा इसका उदाहरण है।

फाग गीत

फाग वे लोकगीत हैं जो फाल्गुन मास में गाए जाते हैं। इनकी विशेषता यह है कि इनमें भक्ति, हास्य और श्रृंगार — तीनों भाव एक साथ आते हैं। ब्रज और राजस्थान दोनों की फाग परंपराएं समृद्ध हैं, और गांवों की फाल्गुन बैठकों में ही नए फाग गीत रचे जाते हैं तथा पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी तक पहुंचते हैं।

अहमदाबाद में होली के आयोजन

अहमदाबाद में राजस्थानी होली मुख्यतः तीन रूपों में मनाई जाती है।

समाज का स्नेह मिलन

अधिकांश समाज संगठन होली के अवसर पर स्नेह मिलन आयोजित करते हैं — जैसे राजपुरोहित समाज, कांकरिया में गौड़ ब्राह्मण समाज और सोला में क्षत्रिय राजपूत समाज। इनमें सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, बच्चों के कार्यक्रम और सामूहिक स्नेह भोज सम्मिलित रहते हैं। बड़े शहरों में जहां समाज के परिवार दूर-दूर बसे होते हैं, वहां यही आयोजन वर्ष का प्रमुख मिलन बन जाते हैं।

सोसाइटी और मोहल्ला होली

आवासीय सोसाइटियों के कॉमन गार्डन में होने वाले पारिवारिक होली महोत्सव सबसे तेजी से बढ़े हैं। शहरों में बसे परिवारों के लिए यह गांव की होली का विकल्प बन जाता है, जहां पूरा परिसर एक बड़े परिवार की तरह उत्सव मनाता है। शाहीबाग में विभिन्न समूहों का साथ होली खेलना इसी का उदाहरण है।

सेवा के साथ होली

अनेक संस्थाएं होली को सेवा कार्य से जोड़ देती हैं। वृद्धाश्रम के बुजुर्गों के साथ मनाई गई होली और महिला दिवस के साथ जुड़ा होली मिलन इसके उदाहरण हैं। कांकरिया के होली महोत्सव में तो नाट्य मंचन भी सम्मिलित रहा।

सुरक्षित और जिम्मेदार होली

  • प्राकृतिक रंग — रासायनिक रंगों से त्वचा और आंखों को नुकसान होता है। हल्दी, चंदन और फूलों से बने प्राकृतिक रंग बेहतर विकल्प हैं।
  • सूखा गुलाल — शहरों में सूखे गुलाल का चलन बढ़ा है, जो पानी की बचत करता है और छुड़ाने में आसान होता है।
  • सहमति — किसी पर भी उसकी सहमति के बिना रंग न डालें। यह होली की मूल भावना — आपसी सद्भाव — का ही हिस्सा है।
  • बच्चों की सुरक्षा — सोसाइटी स्तर के आयोजनों में बच्चों के लिए अलग और सुरक्षित स्थान रखें।
  • ध्वनि सीमा — रात्रिकालीन आयोजनों में ध्वनि नियमों का पालन आवश्यक है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

गेर और घूमर में क्या अंतर है? — गेर पुरुषों द्वारा डंडों के साथ किया जाने वाला नृत्य है, जबकि घूमर मुख्यतः महिलाओं का नृत्य है जिसमें घेरदार घाघरा पहनकर गोल घेरे में घूमा जाता है।

चंग और डफ में क्या फर्क है? — दोनों बड़े गोलाकार चर्म वाद्य हैं और बहुत मिलते-जुलते हैं; क्षेत्र और आकार के अनुसार नाम बदल जाता है। दोनों ही फाल्गुन के आयोजनों के प्रमुख वाद्य हैं।

राजस्थान में होली कितने दिन मनाई जाती है? — औपचारिक रूप से होलिका दहन और धुलंडी दो दिन के होते हैं, किंतु फाग गीतों और चंग की बैठकों का सिलसिला वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है।

गींदड़ कहां मनाया जाता है? — मुख्यतः शेखावाटी क्षेत्र में — सीकर, चूरू और झुंझुनूं जिलों में।

अहमदाबाद में गेर महोत्सव कब होता है? — होली के आसपास, प्रायः फाल्गुन मास में। आयोजन की तिथियां हर वर्ष पंचांग के अनुसार बदलती हैं और स्थानीय समाज संगठनों द्वारा पहले घोषित की जाती हैं।

क्या इन आयोजनों में सबका प्रवेश खुला होता है? — अधिकांश सार्वजनिक गेर और फागुन महोत्सव में प्रवेश खुला रहता है। समाज विशेष के स्नेह मिलन प्रायः सदस्यों के लिए होते हैं।

निष्कर्ष

होली राजस्थानी समाज के लिए वर्ष का वह अवसर है जब भेदभाव की रेखाएं सबसे धुंधली पड़ जाती हैं — रंग लगने के बाद सब एक जैसे दिखते हैं। अहमदाबाद में बसे परिवारों के लिए गेर, घूमर और चंग की थाप केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी से जुड़े रहने का माध्यम है। और यही कारण है कि हर फागुन में यह परंपरा नए सिरे से जीवित हो उठती है।

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