राजलदेसर की होली इस बार भी पारंपरिक चंग की लयबद्ध थाप से गूंज उठी। चंग राजस्थान की होली का केंद्रीय लोक वाद्य माना जाता है।
उत्साह से थिरके लोग
चंग की थाप पर पूरा समाज उत्साह के साथ नृत्य करता नजर आया, और इसी ताल ने त्योहार का स्वर तय किया।
हर वर्ष की परंपरा
यह परंपरा राजलदेसर की होली के केंद्र में हर वर्ष बनी रहती है।
चंग क्या है
चंग एक बड़ा गोलाकार चर्म वाद्य है, जो डफ से मिलता-जुलता है। इसे एक हाथ से पकड़कर दूसरे हाथ की उंगलियों और हथेली से बजाया जाता है। फाल्गुन मास आते ही राजस्थान के गांवों-कस्बों में चंग निकल आते हैं और होली तक प्रतिदिन संध्या को इनकी थाप सुनाई देती है।
वाद्य और सामूहिकता
चंग की विशेषता यह है कि इसे बजाने के लिए किसी औपचारिक प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि हर आयु वर्ग के लोग इसमें सहज सहभागी बन जाते हैं, और यह वाद्य सामूहिक उत्सव का प्रतीक बन गया है।
फाल्गुन की बैठकें
राजस्थान के गांवों में फाल्गुन आते ही प्रतिदिन संध्या को चंग की बैठकें जमने लगती हैं, जो होली तक चलती हैं। इन बैठकों में नए फाग गीत बनते हैं और पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी तक लोकगीतों का हस्तांतरण होता है।


