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सुंदरकांड पाठ — महत्व, विधि, लाभ और अहमदाबाद की परंपरा

8 September 2026
A Sundarkand Path in progress at a temple

सुंदरकांड गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस का पंचम सोपान है — वह अध्याय जो पूरी तरह हनुमान जी के पराक्रम, बुद्धि और भक्ति को समर्पित है। अहमदाबाद में बसे राजस्थानी समाज के लिए सुंदरकांड केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि हर महीने दोहराया जाने वाला सामूहिक अनुष्ठान है। नरोल की किसी सोसाइटी हो या शाहीबाग का कोई मंदिर — किसी न किसी स्थान पर सुंदरकांड का पाठ चलता ही रहता है।

सुंदरकांड क्या है

श्रीरामचरितमानस सात कांडों में विभाजित है — बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड, लंकाकांड और उत्तरकांड। इनमें सुंदरकांड पांचवां है।

इसमें लगभग 60 दोहे और 500 से अधिक चौपाइयां हैं, साथ ही श्लोक और सोरठे भी सम्मिलित हैं। पूरे रामचरितमानस में यह एकमात्र ऐसा कांड है जिसके केंद्र में भगवान राम नहीं, बल्कि उनके भक्त हनुमान हैं।

इसका नाम “सुंदर” क्यों पड़ा

इसके नामकरण को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार लंका जिस त्रिकूट पर्वत पर स्थित थी, उसके तीन शिखरों में से एक का नाम “सुंदर” था — और चूंकि इस कांड की अधिकांश घटनाएं वहीं घटती हैं, इसे सुंदरकांड कहा गया। दूसरी मान्यता यह है कि इस कांड में सब कुछ सुंदर है — हनुमान जी का कार्य सुंदर, सीता माता की धैर्यशीलता सुंदर, और अंततः परिणाम भी सुंदर।

सुंदरकांड की कथा — संक्षेप में

कथा वहां से आरंभ होती है जहां हनुमान जी सीता माता की खोज में समुद्र लांघने के लिए तैयार होते हैं। जामवंत उन्हें उनकी विस्मृत शक्ति का स्मरण कराते हैं — और यही इस कांड का पहला और सबसे महत्वपूर्ण संदेश है: अपनी सामर्थ्य को पहचानना

आगे की यात्रा में वे सुरसा की परीक्षा उत्तीर्ण करते हैं, लंकिनी का मान-मर्दन करते हैं, विभीषण से भेंट करते हैं, और अंततः अशोक वाटिका में सीता माता को खोज निकालते हैं। माता को श्रीराम की मुद्रिका सौंपकर वे उन्हें धैर्य बंधाते हैं। इसके पश्चात अक्षय कुमार वध, रावण की सभा में निर्भीक संवाद और लंका दहन के प्रसंग आते हैं। कांड का समापन श्रीराम को सीता माता का समाचार सुनाने के साथ होता है।

सुंदरकांड पाठ का महत्व और लाभ

भक्तों की मान्यता में सुंदरकांड के पाठ को विशेष फलदायी माना गया है। इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि यह कांड सफलता का कांड है — इसमें हनुमान जी अपना कार्य पूर्ण करते हैं, कहीं असफल नहीं होते।

  • भय और बाधाओं का निवारण — संकट के समय सुंदरकांड पाठ की परंपरा सर्वाधिक प्रचलित है।
  • आत्मविश्वास की वृद्धि — जामवंत द्वारा हनुमान जी को उनकी शक्ति स्मरण कराने का प्रसंग इसका मूल संदेश है।
  • नए कार्य के आरंभ में — गृह प्रवेश, व्यवसाय आरंभ या विवाह जैसे अवसरों पर पाठ कराया जाता है।
  • सामूहिक एकता — मोहल्ले या समाज के लोग एक साथ बैठकर पाठ करते हैं, जिससे सामाजिक जुड़ाव बढ़ता है।

सुंदरकांड पाठ की विधि

सुंदरकांड का पाठ करने के लिए किसी जटिल अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं होती। सामान्य रूप से अपनाई जाने वाली विधि इस प्रकार है:

  1. स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  2. हनुमान जी के चित्र या प्रतिमा के समक्ष दीपक प्रज्वलित करें। चमेली के तेल का दीपक और सिंदूर अर्पित करने की परंपरा है।
  3. पहले गणेश वंदना और श्रीराम का स्मरण करें, फिर पाठ आरंभ करें।
  4. पाठ बीच में न रोकें — यदि आवश्यक हो तो दोहे के बाद विराम लें।
  5. समापन पर हनुमान जी की आरती करें और प्रसाद वितरित करें। बूंदी, गुड़-चना या लड्डू का भोग सामान्य है।

मंगलवार और शनिवार को पाठ के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। पूरा पाठ पढ़ने में सामान्यतः डेढ़ से दो घंटे लगते हैं।

संगीतमय सुंदरकांड — एक बदलती परंपरा

पिछले दो दशकों में संगीतमय सुंदरकांड का चलन तेजी से बढ़ा है। इसमें चौपाइयों को राग और लय में बांधकर प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें हारमोनियम, ढोलक, तबला और मंजीरे की संगत होती है।

इसका सबसे बड़ा व्यावहारिक लाभ यह है कि सामान्य पाठ की तुलना में श्रोता इसमें अधिक देर तक जुड़े रहते हैं। बच्चे और युवा, जो लंबे पाठ में बैठने से कतराते हैं, संगीत की लय पर सहज ही सहभागी बन जाते हैं। यही कारण है कि अहमदाबाद के लगभग सभी सार्वजनिक आयोजनों में अब संगीतमय स्वरूप ही चुना जाता है।

इन आयोजनों में वाचक की भूमिका निर्णायक होती है। अहमदाबाद में श्री सुंदरकांड सत्संग मंडल (इसनपुर), श्री मारुति नंदन सुंदरकांड मंडल और श्री पवनपुत्र सुंदरकांड सेवा मंडल जैसी अनेक मंडलियां नियमित रूप से प्रस्तुति देती हैं।

अहमदाबाद में सुंदरकांड की परंपरा

अहमदाबाद में बसे प्रवासी राजस्थानी समाज ने सुंदरकांड को अपने सामाजिक जीवन का स्थायी हिस्सा बना लिया है। यहां यह परंपरा मुख्यतः चार रूपों में दिखाई देती है।

1. मासिक शृंखलाएं

कुछ मंडल वर्षों से हर महीने निश्चित तिथि पर पाठ कराते हैं। शाहीबाग के राणी शक्ति मंदिर में श्री मेहंदीपुर बालाजी मित्र मंडल की शृंखला इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जो 35वें, 37वें और 39वें आयोजन तक निर्बाध चलती रही है।

2. गृह प्रवेश पर

नए घर में प्रवेश के अवसर पर सुंदरकांड कराना सबसे प्रचलित परंपरा है। मान्यता है कि हनुमान जी की उपस्थिति से घर में नकारात्मक शक्तियों का प्रवेश नहीं होता। न्यू नरोल के कर्णावती-7, इसनपुर के एम्पायर इवोक, नरोल में भंवरसिंह राजपुरोहित परिवार और वटवा के कर्णावती-7 — सभी इसी परंपरा के उदाहरण हैं।

3. व्यक्तिगत अवसरों पर

जन्मदिन और विवाह वर्षगांठ जैसे निजी अवसरों को सामूहिक भक्ति आयोजन में बदल देना इस समाज की विशिष्ट पहचान है — जैसे थलतेज में दुदावत परिवार ने पुत्र के जन्मदिन पर और नरोल के आर्यमान फ्लैट में एक परिवार ने विवाह वर्षगांठ पर कराया।

4. सोसाइटी और मोहल्ला आयोजन

आवासीय सोसाइटियों के साझा परिसरों में होने वाले आयोजन सबसे तेजी से बढ़े हैं। रेनबो हाइट्स, पुष्कर हाइट्स, पुष्पकुंज सोसाइटी, वाराही पार्क और रानिप की श्री नारायण रेजिडेंसी इसके उदाहरण हैं। फ्लैट संस्कृति में जहां पड़ोसियों से परिचय कम हो जाता है, वहीं ये आयोजन पूरे परिसर को एक बार साथ बैठने का अवसर देते हैं।

सुंदरकांड आयोजन कैसे कराएं

यदि आप अपने घर, सोसाइटी या मंदिर में सुंदरकांड पाठ कराना चाहते हैं, तो व्यावहारिक रूप से इन बातों का ध्यान रखें:

  • तिथि और समय — संध्या 5 से 8 बजे का समय सबसे उपयुक्त रहता है, क्योंकि कामकाजी परिवार इसी समय उपलब्ध होते हैं।
  • मंडली — संगीतमय पाठ के लिए मंडली से कम से कम दो-तीन सप्ताह पूर्व तिथि तय करें।
  • बैठक व्यवस्था — दरी, चादर और महिलाओं-पुरुषों के लिए पर्याप्त स्थान।
  • पुस्तिकाएं — सामूहिक पाठ के लिए सुंदरकांड की पुस्तिकाएं वितरित करें, ताकि सभी साथ पढ़ सकें।
  • दरबार सज्जा — हनुमान जी का चित्र, फूल, अखंड ज्योत और भोग।
  • प्रसाद — आरती के बाद प्रसाद वितरण अनिवार्य माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

सुंदरकांड रामचरितमानस का कौन सा कांड है? — यह पंचम सोपान अर्थात पांचवां कांड है, जो किष्किंधाकांड के बाद और लंकाकांड से पहले आता है।

सुंदरकांड में कितने दोहे और चौपाइयां हैं? — इसमें लगभग 60 दोहे और 500 से अधिक चौपाइयां हैं, साथ ही श्लोक और सोरठे भी।

सुंदरकांड का पाठ कब करना चाहिए? — मंगलवार और शनिवार विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त हनुमान जन्मोत्सव, गृह प्रवेश और किसी नए कार्य के आरंभ पर पाठ कराने की परंपरा है।

पूरा सुंदरकांड पढ़ने में कितना समय लगता है? — सामान्य गति से पाठ करने पर लगभग डेढ़ से दो घंटे। संगीतमय स्वरूप में तीन से चार घंटे तक लग सकते हैं।

क्या महिलाएं सुंदरकांड का पाठ कर सकती हैं? — हां। सुंदरकांड पाठ पर कोई प्रतिबंध नहीं है और अहमदाबाद के अनेक आयोजनों में महिलाएं पाठ, संचालन और व्यवस्था — तीनों में अग्रणी भूमिका निभाती हैं।

संगीतमय सुंदरकांड और सामान्य पाठ में क्या अंतर है? — सामान्य पाठ में चौपाइयां सीधे पढ़ी जाती हैं, जबकि संगीतमय स्वरूप में उन्हें राग-लय में वाद्ययंत्रों के साथ प्रस्तुत किया जाता है, जिससे श्रोता अधिक देर तक जुड़े रहते हैं।

निष्कर्ष

सुंदरकांड अहमदाबाद के प्रवासी राजस्थानी समाज के लिए आस्था और सामाजिक जुड़ाव — दोनों का माध्यम है। यह अपनी जड़ों से दूर बसे परिवारों को न केवल अपनी परंपरा से जोड़े रखता है, बल्कि मोहल्ले और सोसाइटी के लोगों को महीने में एक बार साथ बैठने का अवसर भी देता है। यही सामूहिकता इस परंपरा की असली शक्ति है।

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